Tuesday, May 19, 2009

सहर



क्या कौंधा कि उम्मीदों-सी नज़र हुई है,

ठहरे हुए समंदर में इक लहर हुई है।


बहुत दिनों तक मौसम ये मायूस रहा,

आंखें आज बहारों की मुंतज़र हुई हैं।


कांटों के ऊपर से कितने दिन गुजरे,

कितनी मुश्किल से मंजिल ये डगर हुई है।


आफ़ताब बन गए आज ये चांद-सितारे,

बहुत दिनों के बाद शाम ये सहर हुई है।


फिर से आए शाम, तो आए क्या ग़म है,

यों ही अब तक कहां हमारी सहर हुई है।

Monday, May 18, 2009

खारिज़

तू मुझे कुछ भी न दे, कुछ भी न दे, कुछ भी न दे
अपने दो-चार पलों की यही दौलत दे दे
तुम्हारे साथ की वो जिंदगी तो मिल न सकी
यूं ही जीना है तो अब जीने की फितरत दे दे...

तुमसे खारिज़ अपने मासूम इन अश्कों के लिए
एक फरियाद है कि तू इन्हें झूठा न कहे
कि समझता हूं तेरी राह की मंजिल है जहां
वहां की धूल में भी मेरे लिए जगह नहीं
तू जिस जहान की बनी है जो जहां है तेरा
न उसमें एक पल की ठांव मेरी खातिर है

कि इसके बाद भी कि अब तलक के हासिल से
मैं जो अरज सका हूं वो तुम्हारा होना है
कहां हूं मैं कि क्या जमीन मेरी मालूम है
कि जिसको छोड़ चला मैं मगर कहां छूटा

मेरे शहर की निगाहें अभी वहीं की हैं
कि जिसको छोड़ चला मैं कभी का बंजारा
जहां रुका वहां से बार-बार खारिज़ हूं...

Sunday, October 26, 2008

नींद



जाड़े और गर्मी के
दोपहर में कितना फर्क होता है
हां आसमान
शब्दों की परिभाषाओं को
मौसम के हिसाब से बदलना होता है

यह वहम अब तक बना है
कि प्रेम एक स्वतःस्फूर्त क्रांति है
कई-कई बंधनों से आजादी का गीत है
लेकिन आसमान को छूने की भूख में
जमीन से भी जाता हुआ मेरा वह वहम
कैसे धूल बन कर
धुंआ बन कर
इस ब्रह्मांड के हर एक कोने से बेजार हो गया है

हां आसमान
तब से बहुत पिछड़ा महसूस करता हूं
जब से तुमने ये एहसास कराया है
कि प्रेम आजादी में खलल है
प्रेम आजादी को खत्म करता है

जब भी याद आती है तुम्हारी
याद करता हूं कि मेरी रीढ़ है कि नहीं
मेरी रीढ़ सिहरने लगती है

जब भी तुम याद आते हो
अपनी आंख में भर आए आंसुओं पर
शक होने लगता है
और चीख पड़ता हूं पूरी ताकत से
कि नहीं...
मैं नाटक नहीं कर सकता


क्या बादलों का एक छोटा-सा टुकड़ा हाथ में लेकर
आसमान की राह देखना बेईमानी है
कैसे बचाऊं ईमान

होश खोकर झूमना अब तक नहीं सीख सका
इसलिए मेरे कई दोस्त
चेतना के स्तर पर
पिछड़ा कहने लगे हैं मुझे

शायद सच कहते हैं वे
झूमने के लिए नींद से बाहर आना जरूरी है न
मैं तो हजारों सालों से सोया हूं

लेकिन मैं भी सुबह का सूरज देखना चाहता हूं
साफ नीला आकाश देखना चाहता हूं
सितारों की ओर बढ़ना चाहता हूं

उन लताओं की मानिंद
जो सब कुछ खुद में समेटते हुए
छा जाती हैं
जिस पर आ जाती हैं

लेकिन इसके लिए रात को खत्म होना होगा न
मेरी इस नींद को खत्म होना होगा न

कैसे नींद खुले मेरी

बताओ न आसमान...।

Monday, September 22, 2008

रोज शाम को खाली-खाली...



रोज सहर उम्मीदों जैसी
रोज शाम को खाली-खाली
यूं ही छत पर पड़े-पड़े
कब तक तारे गिनते जाएं
इन आंखों को थकना भी है
थक के थोड़ा सोना भी है
और कोई आए, न आए
कम-से-कम इक सपना आए
हर शब के आखिरी पहर तक
उम्मीदों के रोज सहर तक...।

Thursday, September 18, 2008

अब थकना है और सोना है...



और यहां क्या होना है,
गर है कुछ तो वह सोना है।

हीरे-मोती का क्या करना,
ज़ीस्त-ओ-जहां सब सोना है।

हंसना है या रोना है,
हर पल अपना सोना है।

ख्वाबों में भी खुले नहीं,
वही नींद अब सोना है।

सुनो शेष जी बहुत जी लिए,
अब थकना है और सोना है।

Tuesday, August 19, 2008

मेरे साथ


फिर से इस शहर की हवा ने छुआ है मुझे
फिर से उम्मीद ले के आएगी हर सुब्ह
फिर से हर राह यूं बढ़ेगी मंजिलों की तरफ
कि जैसे अब ये दुनिया मिरी हो जाएगी
अब मिरी राह मे गीतों के उजाले होंगे
अब आसमान ये आएगा मेरे पहलू में

मगर इस सबसे कहां रुक सकेगी आज की शाम
जहां रोज की तरह ढलेगी मेरी सुब्ह
और फिर से वही तारीकियां हो जाएंगी जवां
खलाएं-खलिश और मायूस-सी दास्तान
जो आज भी हैं साथ मेरे
और कुछ भी नहीं।

Tuesday, November 20, 2007

मेरा शहर


एक शहर छोड़ के आया हूं
एक नए शहर में आया हूं
जो शहर छोड़ के आया हूं
तो खुद को तोड़ के आया हूं
कुछ दरवाजे छूटे होंगे
कुछ रिश्ते भी टूटे होंगे
किसने छोड़ा, किसने तोड़ा
यह तय करना तो मुश्किल है
पर इतना तो तय है फिर भी
जब सीने के खूं से सन कर
घर कोई जोड़ा जाता है
तब अश्क लहू बन रिसते हैं
जब घर वह छोड़ा जाता है

यह मिट्टी-गारे क्या समझें
पानी क्या है और खूं क्या है
बस सीना थोड़ा दुखता है
बस सांसें थोड़ी रुकती हैं
जब सांसें रुकने लगती हैं
दरवाजा तभी छूटता है
और शहर तभी छूटता है


धीरे-धीरे
अंदर ही अंदर
कोई महल टूटता है
पर कहीं किसी के कानों में
आवाज नहीं जा पाती है
और कोई आवाज कहीं
चुपचाप दफन हो जाती है

पर उम्मीदों का क्या कीजै
सुन ले कोई
बस यही सोच कर
नए शहर में जाती हैं
पर क्या कीजै
इस नए शहर में
रंग बहुत ही ज्यादा हैं
गलियां गर चौड़ी हैं इसकी
तो भीड़ बहुत ज्यादा भी है
जो भीड़ बहुत ज्यादा है तो
कुछ चेहरे पीछे छूटेंगे
लोगों के बोझ तले दब कर
कुछ घर की छत भी टूटेगी
कुछ लोगों के सिर फूटेंगे


पर भीड़ रुकेगी क्यों आखिर
किसकी मंजिल है कहां किधर
इन बातों से है क्या मतलब
किसके जूतों से कौन दबा
रुक कर रोया
पर भीड़ रुकी किसकी खातिर

जो ठोकर खाकर गिरे यहां
जज्बातों में बह गए यहां
यह भीड़ उन्हें ही रौंदेगी
उन पर यह भीड़ हंसेगी भी
गिरने वाला
रोने वाला
लाचार टूट कर शायद तब
हो जाएगा जब खत्म यहां
जब भीड़ गुजर जाएगी
तब भी शेष बचा रह जाएगा
चल देगा फिर से उस रस्ते
जो नए शहर को जाता है।